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सक्सेस स्टोरीः 10 साल पहले एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ था ‘PAYTM’ के संस्थापक विजय शेखर शर्मा का सफर, आइए रूबरू होते हैं पेटीएम व इसके संस्थापक के कुछ अनछुए पहलू से

उन्होंने अपना अधिकांश समय पुस्तकालय में अंग्रेजी में लिखीं सफलता की कहानियाँ पढ़कर बिताना शुरू कर दिया। सफलता की इतनी सारी कहानियों को पढ़ने के बाद, वह स्पष्ट रूप से समझ गए थे, कि अगर वह अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो उन्हें खुद का मालिक होना चाहिए।

यूथ खास। यूथ मुकाम न्यूज नेटवर्क
करीब 10 साल पहले एक छोटे से कमरे से शुरू हुआ सफर निरंतर नए मुकाम बनाते हुए आगे बढ़ रहा है। हम बात कर रहे हैं ‘पेटीएम के संस्थापक विजय शेखर शर्मा की। जो कहते हैं-“मुझे सोने की जरूरत नहीं है, मैं एक सपना जी रहा हूँ”। सही है सपने वहीं सच होते हैं जो जागते हुए देखा जाय और इसे पूरा करने के लिए निरंतर काम किया जाय, सही मार्गदर्शन में। वैसे वे निजी जिंदगी में काफी यायावर हैं। कहते हैं अगर मैं पेटीएम का संस्थापक नहीं होता तो शायद घुमक्कड़ होता या अपना एक म्यूजिक कन्सर्ट चला रहे होते। बहरहाल पेटीएम के दस साल के सफर में कई बाधाएं आई, मगर वे उससे पार करते गए। उनके सपने ने उन्हें एक अलग मुकाम व पहचान दे दी। एक आइडिया ने उनकी जिंदगी के मायने-मतलब बदल दिए।
आइए इनके बारे में जानते हैं सबकुछ। उनकी सफलता की कहानी के साथ-साथ जिंदगी के अनछुए पहलू से भी रूबरू होते हैं।

पहले पेटीएम के सफर पर नजर डालते हैं।

पेटीएम के सीईओ विजय शेखर शर्मा का जन्म 8 जुलाई, 1973 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उनकी प्रतिभा को ध्यान में रखते हुए, एक विशेष अनुमति के माध्यम से 15 साल की उम्र में ही उन्हें दिल्ली इंजीनियरिंग कॉलेज में भर्ती कराया गया था। अन्य हिंदी माध्यम के छात्रों की तरह, विजय शर्मा को भी कॉलेज के प्रोफेसर द्वारा इंग्लिश में दिए गए व्याख्यानों को समझना मुश्किल लगता था । और इसी वजह से कक्षा में, जब भी विजय को उनके प्रोफेसरों द्वारा कोई सवाल पूछा गया, तो वे इसका जवाब नहीं दे सके। उनके सहपाठी भी इस वजह से उनका मजाक उड़ाते थे। इसलिए, जल्द ही उन्होंने कक्षाओं में रुचि खो दी।

फिर उन्होंने अपना अधिकांश समय पुस्तकालय में अंग्रेजी में लिखीं सफलता की कहानियाँ पढ़कर बिताना शुरू कर दिया। सफलता की इतनी सारी कहानियों को पढ़ने के बाद, वह स्पष्ट रूप से समझ गए थे, कि अगर वह अपने जीवन में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो उन्हें खुद का मालिक होना चाहिए। इसलिए, विजय शर्मा ने अपने कोलेज के क्लासेस से ही कोडिंग सीखना शुरू किया। कुछ दिनों के बाद, उन्होंने और उनके एक दोस्त ने मिलकर indiasite.net नामक एक वेबसाइट विकसित की, जो मूल रूप से एक Search Engine था। 2 साल के बाद एक अमेरिकन कंपनी ने उनका website खरीद लिया।

वन 97 की स्थापना
उसके बाद, 1 साल के लिए विजय ने अपनी खुद की कंपनी शुरू करने के लिए पर्याप्त धन जुटाने के लिए कई उत्पादों में काम किया। वर्ष 2000 में, उन्होंने अपनी कंपनी वन 97 को शुरू किया। One97 का उपयोग लोगों की सुविधा प्रदान करने के लिए किया जाता था। अगर कोई यह जानना चाहता है कि उन्हें कौन कॉल कर रहा है, तो उसे सिर्फ One97 कंपनी को नंबर मैसेज करना होगा, कंपनी उस मैसेज को उस व्यक्ति का विवरण प्रदान करेगी जो उस फोननंबर का मालिक है। लेकिन कंपनी को चलाने के लिए उनकी बचत कम हो गई, इसलिए अपनी कंपनी को विकसित करने के लिए उन्हें बैंक से ऋण लेना पड़ा।

अपनी कंपनी को चलाने के लिए, कभी-कभी पेटीएम के सीईओ विजय शेखर शर्मा को 24% ब्याज दर के साथ भी ऋण लेना पड़ता था। वह लाभ जो वह अपनी कंपनी से कमा रहा था, वह सब बैंक के ब्याज, कर्मचारी के वेतन और उसके घर के किराए का भुगतान करने में चला जाता था । यहां तक ​​कि एक समय पर, जब उनके पास अपने घर के किराए का भुगतान करने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे, तो वह देर रात घर वापस आते थे और वे जल्दी ही बाहर निकल जाते थे। ताकि मकान मालिक उसे देखने को न मिले। दिन-ब-दिन उनकी वित्तीय स्थिति बदतर होती जा रही थी। यहां तक ​​कि कभी-कभी विजय शर्मा ने अपने दोस्त के घर में रात का भोजन किया, क्योंकि उनके पास भोजन खरीदने के लिए पर्याप्त पैसे नहीं थे।

पीयूष अग्रवाल से मुलाकात
उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वे दिल्ली के मूलचंद होटल्स के पास सड़क किनारे सस्ते पराठे के स्टाल से रात का भोजन करते थे। कभी-कभी जब उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं होते थे, तो विजय शेखर शर्मा ने बाकी की रात बिताने के लिए रात के खाने के रूप में दो कप चाय पी थी। अपनी कंपनी को चलाने के लिए, उन्हें एक सलाहकार और एक प्रशिक्षक के रूप में काम करना शुरू करना पड़ा। इस समय उनकी मुलाकात श्री पीयूष अग्रवाल से हुई। श्री अग्रवाल को कंपनी के सॉफ्टवेयर को विकसित करने के लिए विजय से मदद की जरूरत थी। जब विजय ने ऐसा किया, तो अग्रवाल की कंपनी के मुनाफे में दोगुनी बढ़ोतरी हुई।

विजय के काम से प्रभावित होकर, श्री अग्रवाल ने विजय को अपनी कंपनी के सीईओ का पद सौंपा। इसके जवाब में, विजय ने श्री अग्रवाल से कहा कि उनकी अपनी कंपनी है और किसी भी कीमत पर वह इसे सफल बनाना चाहते हैं। इसलिए, वह उनके प्रस्ताव को स्वीकार नहीं कर सकते। दूसरी ओर, वित्तीय संकट के कारण, विजय शर्मा के परिवार के लोग उन्हें अपनी कंपनी को बंद करके एक अच्छी नौकरी के साथ घर बसाने के लिए मजबूर कर रहे थे। एक तरफ वित्तीय संकट और दूसरे तरफ अपने परिवार के सदस्यों के दबाव ने विजय को पूरी तरह से उदास कर दिया था।

पेटीएम का इतिहास
अंत में जब कोई रास्ता नहीं निकला, तो विजय शर्माने पीयूष अग्रवाल की पेशकश को स्वीकार कर लिया, लेकिन एक शर्त के साथ, कि वह अपने दिन के आधे समय के लिए श्री अग्रवाल की कंपनी की देखभाल करेंगे और बाकी के समय में उनकी खुद की कंपनी को भी संभालेंगे। और इसके लिए श्री अग्रवाल को उन्हें 30 हजार रुपये प्रति माह वेतन देना पड़ेगा। पीयूष अग्रवाल ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। श्री अग्रवाल को विजय की कंपनी का काम भी पसंद आया। उच्च ब्याज दर के कारण, श्री अग्रवाल द्वारा दिए जानेवाली सारी वेतन विजय द्वारा बैंक के ऋण का ब्याज का भुगतान करने में ही खर्च हो जाती थी। जब विजय ने श्री अग्रवाल को इस बारे में बताया, तो मिस्टर अग्रवाल ने विजय की कंपनी का 40% हिस्सा 8 लाख रुपये में खरीद लिया।

उन्होंने देखा कि लोगों के बीच स्मार्टफोन का उपयोग दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है, इसलिए वह उस स्मार्टफोन के साथ कुछ ऐसा करना चाहते थे कि लोग अपने स्मार्टफोन का उपयोग करके आसानी से वित्तीय लेनदेन कर सकें। योजना के अनुसार, 8 जुलाई, 2010 को विजय के 37 वें जन्मदिन पर paytm.com को लॉन्च किया और कुछ दिनों के भीतर One97 कंपनी ने सार्वजनिक रूप से मोबाइल ऐप “Paytm” को भी लॉन्च कर दिया, जो पूर्ण रूप से “Pay Through Mobile” है। हालाँकि पहले यह ऑनलाइन मोबाइल और डीटीएच रिचार्ज की सुविधाओं के साथ शुरू किया गया था, कुछ दिनों के भीतर जब उन्होंने बिजली बिल, गैस बिल, बस टिकट लोगों को भुगतान करने के लिए और अधिक सुविधाओं को इसमें जोड़ा, तो लोग इसे पसंद करने लगे। और सिर्फ 3 साल के भीतर पेटीएम को 25 मिलियन यूजर मिल गए।

पेटीएम का विस्तार
कुछ वर्षों के बाद, Amazon और Flipkart को सेवाएं प्रदान करके Paytm ने ई-कॉमर्स की दुनिया में प्रवेश कर लिया। और हाल ही में उन्होंने उनका खुद का Payment Bank भी शुरू किया है। विजय शेखर शर्मा बहुत ही सरल और व्यावहारिक रूप के इंसान हैं, उनकी जीवनशैली और उनकी कंपनी के नियम इस बात का सबूत हैं। हालाँकि आज पेटीएम ने 814 करोड़ रुपये का कारोबार किया है, लेकिन विजय शेखर शर्मा के पेटीएम के सीईओ का उनके कार्यालय में कोई विशेष कमरा नहीं है , वे अपने कर्मचारियों के साथ उसी स्थान पर काम करते है। एक छोटी सड़क की दुकान से लेकर बड़े शॉपिंग मॉल तक, हर जगह स्वीकार किए जाने के बाद आज पेटीएम इतना सफल हो गया है। अब विजय शेखर शर्मा अपने जीवन से बहुत खुश है, वह कहते है, “मुझे सोने की ज़रूरत नहीं है, मैं एक सपना जी रहा हूँ”।

 

कुछ अनछुये पहलू, जिनसे शायद आप अनजान हो, ये तीन चीजें बेहद पसंद

भारत की सबसे बड़ी डिजिटल पेमेंट कंपनी पेटीएम के संस्थापक और सीईओ विजय शेखर शर्मा को तीन चीजें म्यूजिक, कार और सफर करना बेहद पसंद है। लोग उन्हें अब वीएसएस के नाम से बुलाते हैं। उन्हें अक्सर राजाओं जैसी जिंदगी बिताने वाले व्यक्ति के रूप में पेश किया जाता है और इस बार हमारा प्रयास रहा कि हम पेटीएम को इस ऊंचाई तक ले जाने वाली शख्सियत के बारे में जानें और साथ ही दुनिया को यह दिखाएं कि इस कद और प्रतिष्ठा की कंपनी को स्थापित करने वाले उद्यमी की क्या परिभाषा होनी चाहिये।

इसी कड़ी में हम इस उद्यमी के जीवन के रोचक और अनछुए पहलुओं से रूबरू हुएरू अगर पेटीएम नहीं होता, तो शायद यायावर? विजय दावा करते हैं कि अगर वे डिजिटल वर्ल्ड में क्रांति नहीं कर रहे होते तो इस बात की पूरी उम्मीद है कि वे बंजारा या घुमक्कड़ होते और सिंगर क्रिस मार्टिन या फिर बोनो की तरह कुछ करते। संगीत की धुन पर उनके थिरकते पांव देखने के बाद मेरा उनसे अगला सवाल बिल्कुल स्पष्ट था – क्या आप गाते हैं? उन्होंने कहा, मैं तो नाचना भी नहीं जानता क्योंकि यह एक ऐसी प्रतिभा है जो आप शायद अपने आसपास के वीडियो में देखते हों। मैं गाता भी नहीं हूं, लेकिन मैं वैसे ही स्टेज से बैंड के साथ गाना चाहता था जैसे क्रिस मार्टिन और बोनो गाते थे, वह भी संस्कृत बैंड। विजय को संगीत बेहद पसंद है और वे बताते हैं कि उन्हें भारतीय शास्त्रीय, सूफी, हिंदी, पंजाबी, धिनचक संगीत से लेकर क्रिस मार्टिन और बोनो तक, वे हर प्रकार के संगीत का पूरा आनंद लेते हैं।

इंटरनेशनल खिलाड़ी बेशक विजय को ड्राइविंग बेहद पसंद है लेकिन वे कारों के प्रति दीवानगी नहीं रखते। वे कहते हैं, यह तो अमीरजादों का शौक है और वैसे भी दिल्ली ड्राइविंग सिटी बिल्कुल भी नहीं है। वाहन नहीं बल्कि ड्राइविंग उन्हें एक अलग ही मजा देती है। वे ड्राइविंग करते समय अच्छी बातचीत या फिर संगीत का आनंद लेना पसंद करते हैं। इसके अलावा वे रास्ते में मिलने वाले ट्रैफिक जाम का इस्तेमाल लंबे समय से टल रही बातचीत को पूरा करने के लिये बखूबी करते हैं। विजय की निरंतर यात्राओं से परिपूर्ण दिनचर्या उन्हें वास्तव में विदेश की सड़कों का अनुभव लेने का मौका देती है और वे कहते हैं कि उन्हें वहां पर ड्राइव करना बेहद अच्छा लगता है।

वे कहते हैं अगर आप कुछ ऐसा करते हैं जो करने के आप वास्तव में इच्छुक हैं और करना पसंद करते हैं तो उसे जुनून कहते हैं। अगर आपको लगातार ऐसे काम करने के लिये कहा जाता ह या फिर दबाव डाला जाता है, तो उसे तनाव कहते हैं। जुनून और तनाव एक ही सिक्के के दो पहलू हैं और दोनों बहुत अधिक समय लेते हैं।

विजय के लिये उनका काम ही जुनून है और यही वजह है कि उनके जीवन में तनाव या तकलीफ का कोई क्षण नहीं आया है। विजय को अचानक से प्लान की चीजें काफी पसंद हैं। वे कहते हैं कि वे किसी भी समय जाग सकते हैं। वे टेकस्पार्क्स का हिस्सा बनने के लिये सुबह-सवेरे तीन बजे जाग गए और वे कहते हैं, मेरे फोन में सुबह 6 बजे से पहले के 15 अलार्म स्लॉट हैं। उनका जीवन यात्राओं से भरा हुआ है और वे याद करते हुए बताते हैं कि कैसे एक दिन उन्होंने कई हजार किलोमीटर दूर स्थित दो देशों की यात्रा की और सिर्फ एक दिन के काम के लिये ही 4 अंतरराष्ट्रीय उड़ानों में सफर किया। वे कहते हैं, श्अगर आप किसी काम को करना चाहते हैं तो वह मजा है और अगर आप नहीं करना वाहते तो तनाव। और यह उतना ही सरल और जटिल है जो इस बात पर निर्भर करता है कि आप कहां खड़े हैं।

पूरी तरह शाकाहारी
विजय पूर्णतः शाकाहारी हैं। उन्हें दही-बटाटा-पूरी खाना बेहद पसंद है। उन्होंने रेस्टोरेंटों में जाने और विभिन्न खानों को मिलाकर अपनी नई डिश बनाने का एक नया शौक भी विकसित किया है। वे कहते हैं, मैं टैको की एक दुकान में जाकर बीन लेकर उसे दही और कुछ अन्य चीजों के साथ मिलाकर चाट तैयार करता हूं। मेन्यू पढ़ना उनका एक और पसंदीद शौक है। विजय का कहना है कि उन्हें खाने और उसकी खुशबू को समझने से बेहद प्यार है। इसके अलावा उन्हें अपने दोस्तों के लिये ऑर्डर करना भी बेहद पसंद है। उन्होंने शाकाहारी के रूप में जिंदगी बिताना सीख लिया है। वे कहते हैं, मैं कई भाषाओं में शाकाहारी शब्द बोल सकता हूं।