बिहार चुनाव आफ्टर इफेक्टः बिहारी मतदाताओं ने ‘बड़बोले’ व ‘हवाबाज’ नेताओं को दिखाई औक़ात

    – अति-आत्मविश्वास, हवाबाजी व अनर्गल बयानबाज़ी ने बिगाड़ दिया चुनावी खेल

    सचिन कुमार सिंह। एडिटर
    बिहार के मतदाताओं ने हर दल के बड़े नेताओं को बहुत करीब से वाच किया। उनकी ठसकबयानी, उनके हाव-भाव, उनके अंदर के गर्व व अहंकार व बड़े-बड़े बोल को, बार-बार करीब से महसूस किया। फिर चुपचाप मतदान कर उन्हंे ऐसा झटका दिया कि वे ईवीएम की खराबी व वोट चोरी के पुराने राग अलापते दिख रहे हैं। तो दबी जुबान अपनी हार को भी स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन कई- किन्तु परंतु के साथ। बिहार की राजनीति इस चुनाव में एक बार फिर अपने उस स्वभाव पर लौटी है, जिसके लिए वह देशभर में जानी जाती है, जहाँ मतदाता शांत रहता है, पर निर्णय ऐसा देता है कि उसके सामने बड़े-बड़े नेता भी नतमस्तक हो जाते हैं।
    2025 के विधानसभा चुनाव ने यह साफ़ कर दिया कि बिहारी मतदाता अब किसी की धमकी, गुंडागर्दी, जातीय ठसक या बड़बोलेपन के प्रभाव में आने वाला नहीं।

    इस बार मतदाताओं ने उन नेताओं को खासकर उनकी औक़ात दिखा दी, जिन्होंने महीनों तक हवा में तीर चलाया, सोशल मीडिया में तूफ़ान मचाया, अपने को “किंगमेकर” या “बूथ लूटवा लेवल” का बताया, लेकिन नतीजे आए तो या तो हार गए, या अपनी “विकट स्थिति” बचाने में ही पस्त नज़र आए।

    ‘दबंग’ छवि बनाए नेताओं का बुरा हाल
    कुछ नेता जो खुद को क्षेत्र का “अघोषित बादशाह” मानकर चलते थे, इस बार मतदाताओं ने उन्हें चुपचाप घर बिठा दिया। जिनके पोस्टर पर ‘जनता का नेता नहीं, जनता का बेटा हूँ’ लिखा था, वे अपने ही पोलिंग बूथ पर दो-तीन सौ वोट भी न जोड़ पाए।

    कई जगह बड़े दावेदार नेताओं का तीसरे-चौथे नंबर पर फिसल जाना इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ शोर से वोट नहीं मिलने वाला।

    सोशल मीडिया में बवाल, लेकिन जनता ने चौन से अस्वीकार कर दिया
    कई “वायरल नेता” जो रोज फेसबुक लाइव, वीडियो बयान और धमकीनुमा भाषण से माहौल बना रहे थे, नतीजों में उनकी हालत देखकर स्पष्ट हुआ कि सोशल मीडिया की राजनीति जमीन पर कागज़ की नाव साबित हुई। जिन्होंने अपने को “लाखों फॉलोअर्स वाला जननेता” बताया, वे अपने वार्ड तक में मतदाताओं को अपनी बात समझा न सके। अब अपनी हार का ठीकरा तरह-तरह की बहानेबाजी कर वोटर्स, चुनाव आयोग व ईवीएम पर फोड़ रहे हैं, मगर खुद हकीकत को स्वीकार कर मंथन करने को तैयार नहीं है। बहुत से नेताओं के चेहरे पर हार की मायूसी भी साफ दिख रही है, लेकिन हेठी यह कि इस जनादेश को भी विन्रमतापूर्वक स्वीकारने को तैयार नहीं हैं।

    जातीय ठसक दिखाने वालों को भी सबक मिला
    कुछ नेताओं को लगता था कि उनकी जाति एकमुश्त वोट ट्रांसफर कर देगी।
    लेकिन इस बार बिहार ने जातीय राजनीति के पैटर्न को भी तगड़ा झटका दिया।
    कई जगह लोगों ने साफ़ कहा- “जाति से पेट नहीं भरता, काम चाहिए।” परिणाम यह हुआ कि कई नेता, जो सिर्फ बिरादरी की गोलबंदी में भरोसा रखते थे, चुनाव में औंधे मुँह गिर पड़े।

    बड़बोले नेताओं को मिला जनता का ‘साइलेंट थप्पड़’
    जिन नेताओं ने चुनावी मंचों पर प्रतिद्वंद्वियों को अपशब्द कहे, सत्ता को चुनौती दी, खुद को “आने वाला मुख्यमंत्री” घोषित कर दिया, मतदाताओं ने उन्हें सबसे बड़े झटके दिए।
    कई जगह ऐसे नेताओं की जमानत तक जब्त होने वाली स्थिति पैदा हो गई।
    एक राजनीतिक विश्लेषक ने तंज कसा कि अब मतदाता साइलेंट रहकर हर किसी को परखता है, भले एनडीए के जीत के कई तात्कालिक कारक गिना दे, मगर बिना जमीन पर ठोस काम किए और आम जनता का भरोसा जीते, बड़ी-बड़ी बातें करने से अब मतदाता झांसे में आने वाले नहीं। वे कोरे वादे नहीं, उन वादों का बकायदा रोडमैप भी चाहता है और उसे धरातल पर उतारने का भरोसा भी। हालांकि मीडिया के द्वारा पीआर के लिए हर तरह की नौटंकी की गई, मगर कुछ काम नहीं आया। वोटरों ने इस बार भी बड़बोले नेताओं को जोर का झटका दे दिया।

    सीएम नीतीश व मोदी की जोड़ी पर ही फिर जताया भरोसा
    सबसे बड़ा संदेश यह निकला कि जो नेता चिल्लाते कम और काम ज्यादा करते हैं, जनता अब उन्हीं को चुन रही है। एन चुनाव के पहले नीतीश कुमार का भावुक वीडियो का भी जबरदस्त प्रभाव पड़ा जिसमें उसने साफ किया कि राजनीतिक जीवन में उन्होंने अपने व अपने परिवार के लिए कुछ नहीं किया और न परिवारवाद को बढ़ावा दिया। इसलिए सेवा के नाम पर आप हमें वोट करें। इसका असर गांव-गिराम तक पड़ा। बूढ़े-बुर्जुर्ग से लेकर नौजवान तक पर पड़ा। और महिला योजनाओं ने तो महिला वोटर का एक अलग वर्ग पहले ही तैयार कर रखा था, जिसमें जीविका दीदी को मिले दस हजार रुपये ने ट्रिगर का काम किया। विपक्ष सिर्फ बड़े-बड़े वादे करता रह गया और सीएम ने उसे धरातल पर उतार, विपक्ष से इस बड़े मुद्दे को भी चुरा लिया। सत्ता में रहने का यह फायदा तो उन्हें मिला और जिसका बहुत हद तक असर भी हुआ। लेकिन इन सबके अलावा उनके बीस साल का काम भी उनके पलटूराम वाली छवि पर भारी पड़ा। और पवन सिंह के चुनावी कैंपेने गीत के बोली की तर्ज पर जोड़ी मोदी व नीतीशजी की हिट हो गई। सामाजिक सद्भाव, सड़क, अस्पताल, महिला योजनाओं और विकास आधारित राजनीति के दम पर मतदाता एनडीए से ही पूरी तरह कनेक्ट रहा। मतदाता ने नई तरह की राजनीति करने का दावा करने वाले प्रशांत किशोर को भी बुरी तरह नकार दिया। क्योंकि मतदाताओं ने उनकी कथनी व करनी का फर्क समझ लिया।
    2025 की यह पटकथा आने वाले चुनावों के लिए भी बिहार की राजनीति की दिशा तय करती दिख रही है।

    आइए उन नेताओं पर एक नजर डालें जिन्होंने बिहार को बदलने का दावा किया, बड़े-बड़े वादे किए, मगर आम जनता किसी तरह के बदलाव के मूड में नहीं दिखी या फिर बदलाव का रिस्क लेने को तैयार नहीं हुई। जो हर विपक्षी दलों के लिए जोरदार झटका है और उन्हें अपनी रणनीति पर फिर से विचार करने के लिए विवश कर रहा है,

    ’प्रशांत किशोर (जनसुराज)
    हजारों सभाएँ, लाखों कदमकृपर परिणाम शून्य के बराबर’’
    प्रशांत किशोर ने चुनाव से महीनों पहले ही बिहार में ‘क्रांति’ का दावा कर दिया था।
    कहा था-“जनता बदलने को तैयार है, जनसुराज की लहर चलेगी”। अपने बड़बोलेपर में उन्होंने यहां तक दावा कर दिया कि अगर जदयू इस चुनाव में 25 से अधिक सीटें लाई तो वे राजनीति से संन्यास ले लेंगे, लेकिन नतीजों में न कोई लहर दिखी, न असर।
    जहाँ दिनभर भीड़ जुटती थी, वहाँ बैलेट में समर्थन गायब था। नतीजा जनसुराज पार्टी कुछ जगहों पर सिर्फ वोटकटवा की हैसियत में आ पाई, कई सीटों पर उनके प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई।
    उनके मजबूत गढ़ मानें जाने वाले इलाकों में भी वोट तीन-चार हजार से आगे नहीं बढ़े।
    पीके ने जितनी मेहनत की, उतना वोट नहीं मिला। साफ है, मतदाता सुनता है, पर भ्रमित नहीं होता।

    ’’मुकेश सहनी
    ‘सन ऑफ मल्लाह’ की राजनीति डूब गई,चुनावी नौका नहीं चल सकी।
    मुकेश सहनी ने खुद को “नया यादव”, “मल्लाह का मसीहा”, “किंगमेकर” तक बताया।
    यहां तक कह दिया कि “मेरे बिना किसी की सरकार नहीं बनेगी। उन्होंने दबाव की ऐसी राजनीति खेली कि खुद को डिप्टी सीएम फेस घोषित करवा लिया, लेकिन नतीजों में उनकी पार्टी का ग्राफ इतना नीचे गिरा कि कई सीटों पर जमानत की कगार पर पहुँच गए। और पूरी तरह गोल्डन डक बन गये।

    ’’कांग्रेस के ‘मूड एक्सपर्ट’ नेता
    कांग्रेस के कई नेताओं ने दावा किया कि बिहार में “मोदी-नीतीश के खिलाफ स्विंग” है।
    कांग्रेस के खेवनहार राहुल गांधी वोट चोरी व एसआईआर के अलावा मोदी को वोट चोर बताने की राजनीति से आगे नहीं बढ़ पाए। अन्य कांग्रेस नेता भी हकीकत से कोसों दूर इसी नैरेटिव को सेट करने में लगे रहे। रही सही कसर महागठबंधन के बीच अंत-अंत तक सीट शेयरिंग की खींचतान व बेमन से चुनाव प्रचार अभियान ने भी कांग्रेस की नैया बिहार में डुबो दी और 61 सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस महज 6 सीटों पर सिमट गई। इनमें भी दो सीटों पर हारते हारते किसी तरह जीत पाई।

    वहीं इनके समर्थक निर्दलीय सासंद पप्पू यादव के बड़बोलेपर व विवादित बयानों ने महागठबंधन की नैया डुबोने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।
    पप्पू यादव ने कहा था कि “हम बिहार में विकल्प हैं, हमारी सरकार बनेगी।”
    लेकिन उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा। वहीं तेजस्वी यादव से भी उम्मीद थी कि एमवाय समीकरण व फिर निषाद वोटों के सहारे वे चुनावी मैदान में बेहतर खिलाड़ी साबित होंगे, मगर महागठबंधन के अन्य घटक दलों की तरह इन्हें भी 143 सीटों पर लड़कर महज 25 सीटों पर संतोष करना पड़ा। इस बीच मधुबन विस के राजद नेता मदन साह के श्राप वाले वीडियो को वायरल कर लोगों ने दावा किया कि उन्होंने राजद को 25 सीटों पर ही सिमटने का दावा किया था और उनका श्राप लग गया। हालांकि बाद में मदन साह ने भी इसका खंडन किया। वहीं आवैसी ने भी मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार खड़े किये, लेकिन सीमांचल में कुछ सीटें छोड़ उन्हें बहुत ज्यादा सफलता नहीं मिली, मगर जिस तरह की राजनीति वे करते हैं, उसमें इतनी सीटें पाना और कांग्रेस की बराबरी करना भी उनके लिए बिहार में बड़ी सफलता बन गई, और वे कई सीटों पर राजद का खेल खराब करने में भी सफल रहे। आयातित प्रवक्ताओं ने भी खेल खराब करने में महती भूमिका निभाई

    कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि आजकल सोशल मीडिया का शेर बनने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना चाहिए कि आभासी दुनिया पर जो दिखता है वह सच नहीं होता, सच के लिए हकीकत की जमीन पर जाकर काम करना होता है, आम जनता के वास्तिवक समस्याओं को समझना होता है, सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें व बड़े-बड़े वादे करने से आम जनता का भरोसा जितना अब आसान नहीं रह गया।

    बिहार के मतदाताओं ने साबित कर दिया कि “बातों से बिहार नहीं बदलता, काम से बदलता है। और जिसे काम से मतलब नहीं, उसे वोटर बाहर का रास्ता दिखा देता है।”
    चुनाव की हार पर चाहे जो बहाने बनाए, लेकिन इस हार ने खुद के आकलन का एक बेहतर मौका दिया है, आत्म मंथन कर अपनी कमियों को दूर कर अब वास्तव में नई तरह की राजनीति को धरातल पर उतार कर दिखाना होगा, तभी एनडीए की जड़ को उखाड़ने में सफलता मिल सकती है, इसके लिए धैर्य भी चाहिए व बोली में संयम भी, वरना एक नैरेटिव पूरा खेल खराब कर देती है।

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