– 10 हज़ार योजना ने बदला पूरा खेल
सचिन कुमार सिंह। एडिटर
बिहार में इस बार का चुनाव नतीजा पिछले सभी राजनीतिक अनुमान को ध्वस्त करता हुआ दिखाई दिया। वर्षों से कायम जातीय गठजोड़ पहली बार इस कदर बिखरा कि पूरा समीकरण महिला मतदाताओं व मोदी-नीतीश के संयुक्त प्रभाव में समा गया। इसका सीधा लाभ एनडीए को मिला, जो इस बार प्रदेश में 200 से ज्यादा सीटों तक पहुँच गया।
महिला मतदाता बने गेमचेंजर
चुनाव के दौरान घर-घर चर्चा में रही 10 हज़ार रुपये वाली योजना ने ग्रामीण इलाक़ों में अभूतपूर्व प्रभाव डाला। महिलाओं ने रिकॉर्ड संख्या में वोट डाले और मतदान प्रतिशत में उनकी भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। योजनाओं की सीधी पहुँच, आर्थिक लाभ और परिवार की प्राथमिक ज़रूरतों से सीधे जुड़ाव ने महिलाओं को निर्णायक वोटर बना दिया। यही ‘एम-फ़ैक्टर’ इस चुनाव का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
जातीय समीकरण पीछे छूटे
इस चुनाव में परंपरागत जातीय ध्रुवीकरण पहली बार उतना प्रभावी नहीं दिखा। भाजपा-जदयू के संयुक्त अभियान और ‘स्थिर सरकार’ के वादे ने जाति आधारित निष्ठाओं को कमजोर कर दिया। कई सीटों पर पहली बार ऐसे बूथों में एनडीए को बढ़त मिली, जहाँ पहले जातीय गणित विपक्ष के पक्ष में रहता था।
मोदी-नीतीश की जोड़ी का असर
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता और नीतीश कुमार की विकास योजनाओं का संयुक्त प्रभाव पूर्वी चंपारण में साफ दिखा। दोनों नेताओं की रैलियों में उमड़ी भीड़ तथा प्रशासनिक भरोसे के संदेश ने मतदाताओं के बीच ‘डबल इंजन है तो डिलीवरी तेज है’ जैसी स्पष्ट धारणा बनाई। इसका फ़ायदा एनडीए प्रत्याशियों को सीधे तौर पर मिला।
महिलाओं का वोट एनडीए की जीत का असली आधार
गांवों में महिलाओं का कहना था कि “जो सीधे हमारा हित करे वही हमारा वोट पाएगा।” इस भावना ने पारंपरिक सामाजिक दबावों को तोड़ा और मतदाता पहली बार इतने बड़े पैमाने पर स्वतंत्र निर्णय लेते दिखे।
विशेषज्ञों के अनुसार
-महिला मतदाताओं की रिकॉर्ड भागीदारी
-लाभार्थी योजनाओं की सीधी पहुँच
– मोदी-नीतीश के विकासदृविश्वास मॉडल
ने मिलकर एनडीए को ऐतिहासिक बढ़त दिलाई है।
इस बार सिर्फ राजनीतिक मुकाबला नहीं रहा, बल्कि यह बिहार की बदलती सामाजिक- राजनीतिक चेतना का संकेत भी है। जातीय समीकरण के बजाय महिला मतदाता, लाभार्थी वर्ग और नेतृत्व पर भरोसा निर्णायक साबित हुआ। यही नया समीकरण है जिसने एनडीए को प्रदेश में 200 के पार पहुंचाया और चुनावी राजनीति की धारा को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया।
बिहार में 2025 का जनादेश सिर्फ एक चुनाव नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। वर्षों से मजबूत माने जाने वाले डल् समेत सभी जातीय समीकरणों को महिलाओं के सुनियोजित और शांत वोट ने पूरी तरह अप्रासंगिक कर दिया।
1. महिला फैक्टर $ योजनाओं का सीधा फायदा = गेमचेंजर
गाँव-गाँव में महिलाओं ने जाति से ऊपर उठकर वही चुना जिससे घर चल रहा था।
यानी 10,000 वाली प्रत्यक्ष लाभ योजना, मुफ्त राशन, उज्ज्वला, वृद्धा/विधवा पेंशन,
और स्वास्थ्य योजनाओं का भरोसा।
-इन सबने पहली बार महिलाओं को स्वतंत्र राजनीतिक निर्णय की शक्ति दी।
2. मोदी-नीतीश की संयुक्त छवि ने महिलाओं में ‘सुरक्षित और स्थिर शासन’ का भाव पैदा किया। महिला मतदाताओं में सबसे अधिक प्रभाव पड़ा इस धारणा का कि मोदी देंगे सुविधा व नीतीश देंगे सुरक्षा। यह दोहरा भरोसा महिलाओं को किसी भी जातीय या स्थानीय दबाव से अलग करके एनडीए की स्थिरता की ओर खींच ले गया।
3. महिलाओं ने जातीय दबाव को पीछे छोड़ा, सामाजिक समीकरण ढह गए। पहली बार बिहार में महिलाएँ परिवार का दबाव, जातीय अपील, और स्थानीय नेतृत्व की लाइन
को लौटाकर बूथ तक पहुँचीं और खुद निर्णय लिया। उनका एकतरफा झुकाव इतना प्रबल था कि माय जैसे मजबूत समीकरण भी टिक नहीं पाए।
महिलाओं ने इस बार सिर्फ सरकार नहीं चुनी, बल्कि दो नेतृत्वों मोदी और नीतीश के सम्मिलित भरोसे को चुना। इस भरोसे का असर इतना गहरा था कि जहाँ जातीय समीकरणों को 20-30 सीटों पर असर करना चाहिए था, वहीं महिलाओं के एकतरफा वोट ने 100 से अधिक सीटों का सीधा असर पैदा किया।
बहरहाल, इस चुनाव ने एक साथ कई नैरेटिव व धारणाएं ध्वस्त हुई। एक बार फिर साबित हुआ कि नीतीश व मोदी के साथ जब बिहार में महिलाओं का फैक्टर जुड़ा, जो वोटिंग प्रतिशत के रूप में सामने आया।


























































