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त्वरित टिप्पणीः भेदभाव रोकने के नाम पर जातिगत द्वेष बढ़ाने वाले यूजीसी एक्ट पर सुप्रीम रोक, कोर्ट की सख्त टिप्पणी से सबक ले सरकार

विशेष रपट। सचिन कुमार सिंह

देश की उच्च शिक्षा व्यवस्था को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा जनवरी 2026 में लागू की गई “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। अदालत ने इन नियमों को “अस्पष्ट, व्यापक और दुरुपयोग की आशंका वाला” बताते हुए केंद्र सरकार और UGC से जवाब मांगा है।
यह रोक केवल तकनीकी नहीं, बल्कि पूरे ढांचे पर गंभीर सवाल है।

यह सवाल इसलिए भी क्योंकि सरकार व यूजीसी की नीयत में खोट नजर आती है, और ऐसा लगता है कि कॉलेज कैंपस को भी राजनीतिक नफरत का केन्द्र बनाने की मंशा है, ताकि शिक्षा ग्रहण के समय ही जातिगत भावना सबके दिलों में गहरे पैठ जाए। एक तरफ सरकार वोट लेने के लिए सबको एक होने को कहते हैं, दूसरी तरफ इस तरह के नीयत लाती है जो देश की बहुत बड़ी जनसंख्या को शोषक कैटगरी में डाल दे। सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी इस बात को पूरा बल देती है कि विरोध गलत धारणाओं पर या बेवजह नहीं है, इस विरोध में दम है। सरकार को समय रहते इस मामले में फूंक-फूंककर कदम रखना चाहिए।

UGC के नए नियम आखिर कहते क्या हैं?
UGC का दावा है कि ये नियम:
विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म-स्थान, दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए बनाए गए हैं।
इसके लिए:
हर संस्थान में Equity Committee, शिकायत निवारण तंत्र, और कड़ी जवाबदेही की व्यवस्था की गई। सुनने में यह उद्देश्य सराहनीय लगता है।
लेकिन कानून सिर्फ़ नीयत से नहीं, भाषा और प्रक्रिया से भी पहचाना जाता है।
असली समस्या कहाँ है?
“भेदभाव” की परिभाषा — जरूरत से ज़्यादा व्यापक
नियमों में भेदभाव को इस तरह परिभाषित किया गया है कि: कोई भी अनुचित व्यवहार
चाहे वह स्पष्ट हो या अंतर्निहित यदि किसी व्यक्ति को लगे कि वह उसकी पहचान से जुड़ा है, तो वह भेदभाव माना जा सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि डांटना,अंक काटना, अनुशासनात्मक कार्रवाई, या अकादमिक निर्णय भी भेदभाव के दायरे में आ सकते हैं — यदि शिकायतकर्ता ऐसा कह दे।
“हितधारक” शब्द — सबसे बड़ा ग्रे एरिया
UGC ने “हितधारक” शब्द का प्रयोग किया है, जिसकी कोई स्पष्ट सीमा नहीं।
इसमें शामिल हो सकते हैं: छात्र,प्रोफेसर,शोधार्थी, प्रशासनिक कर्मचारी, हॉस्टल स्टाफ
यहाँ तक कि संविदा कर्मी यानी संस्था से जुड़ा लगभग हर व्यक्ति।
जब दायरा इतना खुला हो और परिभाषा इतनी ढीली तो शिकायत का दायरा भी अनियंत्रित हो जाता है।
“शिकायतकर्ता = पीड़ित” की धारणा
नियमों में:
शिकायत करते ही व्यक्ति को “पीड़ित” माना गया है, किसी प्रारंभिक जाँच की अनिवार्यता नहीं, यह सीधे प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के विपरीत है, जहाँ आरोपी को पहले सुना जाना चाहिए। झूठी शिकायत पर… कुछ भी नहीं
सबसे गंभीर बात:
यदि शिकायत झूठी, दुर्भावनापूर्ण या निजी दुश्मनी से प्रेरित निकले
तो शिकायतकर्ता पर कोई दंड, जुर्माना या जवाबदेही नहीं
यानी:
आरोप लगाने वाले के लिए कोई जोखिम नहीं,
आरोप झेलने वाले के लिए पूरा करियर दांव पर।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों रोका?
सुप्रीम कोर्ट ने प्रारंभिक सुनवाई में कहा कि:
नियमों की भाषा prima facie अस्पष्ट (vague) है] इससे दुरुपयोग और सामाजिक विभाजन का खतरा है
ऐसे नियम बिना सुरक्षा कवच के लागू नहीं किए जा सकते इसीलिए अदालत ने:
नए 2026 नियमों पर अस्थायी रोक लगाई
और कहा कि 2012 वाले पुराने नियम फिलहाल लागू रहेंगे
डर क्यों जायज़ है?
भारत में अनुभव बताता है कि: जहाँ कानून एकतरफ़ा होता है और प्रक्रिया लंबी और झूठी शिकायत पर कोई सज़ा नहीं वहाँ “आरोप ही सज़ा” बन जाता है।
छात्रों और शिक्षकों को डर है कि:
निजी रंजिश,अकादमिक मतभेद, या व्यक्तिगत दुश्मनी
को जातिगत/पहचान आधारित आरोप में बदला जा सकता है।
क्या भेदभाव रोकना गलत है?
बिल्कुल नहीं।
लेकिन सवाल यह है:
क्या भेदभाव रोकने के नाम पर
निष्पक्ष प्रक्रिया की बलि दी जा सकती है?
संविधान का अनुच्छेद 14 और 15 दोनों कहते हैं:
समानता का मतलब सबको समान डर देना नहीं,
बल्कि सबको समान सुरक्षा देना है।
आगे का रास्ता क्या होना चाहिए?
विशेषज्ञों का मानना है कि:
नियम वापस नहीं, संशोधित होने चाहिए

इनमें जोड़ा जाए:
प्रारंभिक जाँच, समयबद्ध निर्णय, अपील का अधिकार, झूठी शिकायत पर दंड
ताकि वास्तविक पीड़ित को न्याय मिले, और निर्दोष को बर्बाद होने से बचाया जा सके

UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक कोई छोटी घटना नहीं है।
यह चेतावनी है कि: अच्छी नीयत भी, अगर खराब भाषा और अधूरी प्रक्रिया से लागू हो , तो वह न्याय नहीं, अन्याय बन जाती है। अब फैसला सरकार और UGC के हाथ में है, या तो वे संविधान-सम्मत, संतुलित और सुरक्षित नियम लाएँ, या यह बहस और गहरी होती जाएगी।

UGC की नई “Equity / Anti-Discrimination Regulations” पर संविधान के अनुच्छेद 14 व 15 के संदर्भ में कानूनी आपत्ति
संवैधानिक ढांचा
अनुच्छेद 14 – कानून के समक्ष समानता
राज्य किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
मुख्य सिद्धांत:
समान परिस्थितियों में समान व्यवहार, मनमाना कानून निषिद्ध, प्रक्रिया निष्पक्ष होनी चाहिए
अनुच्छेद 15 – भेदभाव का निषेध
राज्य धर्म, जाति, लिंग, जन्म-स्थान आदि के आधार पर भेदभाव नहीं करेगा।
अपवाद:
सामाजिक/शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधान, लेकिन ये प्रावधान न्यायसंगत, सीमित और अनुपातिक होने चाहिए
UGC नियमावली में Article 14 का उल्लंघन
(A) अत्यधिक व्यापक और अस्पष्ट परिभाषाएँ
UGC नियमों में:
“भेदभाव”, “अनुचित व्यवहार”, “अंतर्निहितभेदभाव”, “हितधारक”
इन शब्दों की कोई सटीक कानूनी सीमा नहीं है।
Supreme Court precedent:
अस्पष्ट कानून मनमाना होता है और Article 14 का उल्लंघन करता है
(Shreya Singhal v. Union of India, 2015)
जब कानून यह स्पष्ट न करे कि:
क्या अपराध है, क्या नहीं है, तो वह निष्पक्षता की कसौटी पर फेल होता है।
“आरोप = पीड़ित” का सिद्धांत
UGC नियमों में:
शिकायतकर्ता को प्रारंभ में ही “पीड़ित” माना गया है, कोई prima facie जाँच अनिवार्य नहीं
इससे:
आरोपित व्यक्ति बिना दोष सिद्ध हुए दंडात्मक प्रक्रिया में फँस जाता है
यह presumption of innocence के सिद्धांत का उल्लंघन है
जो Article 14 का अभिन्न हिस्सा है।
(C) झूठी शिकायत पर शून्य जवाबदेही
नियमों में malicious / false complaint पर
कोई दंड या जुर्माने का प्रावधान नहीं
Supreme Court (Subramanian Swamy v. Union of India):
किसी भी अधिकार के साथ उत्तरदायित्व अनिवार्य है
एकतरफ़ा दंडात्मक ढांचा = समान संरक्षण का उल्लंघन
UGC नियमावली में Article 15 का उल्लंघन
(A) जाति को स्थायी पहचान बनाना
नियमों की व्यावहारिक संरचना यह मानकर चलती है कि:
कुछ जातियाँ “स्वतः पीड़ित”
और कुछ “संभावित उत्पीड़क”
यह जन्म-आधारित वर्गीकरण है,
जो Article 15(1) की मूल भावना के विपरीत है।
(B) सुधारात्मक प्रावधान का अति-विस्तार (Overreach)
Article 15(4)/(5) का उद्देश्य:
वास्तविक वंचना को दूर करना
लेकिन UGC नियम:
आर्थिक स्थिति, संस्थागत शक्ति, व्यक्तिगत परिस्थितियों इन सबको दरकिनार कर सिर्फ़ पहचान पर आधारित प्रभाव पैदा करते हैं।
Indra Sawhney Case:
सुधारात्मक उपाय स्थायी, असीमित या अन्य वर्गों के मौलिक अधिकारों को कुचलने वाले नहीं हो सकते।
(C) समान स्थिति वालों के साथ असमान व्यवहार
एक ही व्यवहार:
यदि SC/ST/OBC द्वारा किया जाए → सामान्य अनुशासन
यदि GC द्वारा किया जाए → “भेदभाव” की जाँच, यह classification without rational nexus है
Article 14 + 15 दोनों का उल्लंघन
प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) का हनन
UGC नियमों में स्पष्ट hearing rights नहीं, cross-examination की गारंटी नहीं, time-bound निष्पक्ष प्रक्रिया नहीं, Supreme Court: Natural justice is part of Article 14
बिना प्रक्रिया सुरक्षा, कोई भी “समानता” कानूनी दिखावा मात्र बन जाती है।

 

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