– राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर लंबे समय तक ब्राह्मण-राजपूत समाज को सिर्फ चुनावी मशीनरी के तौर पर देखा गया, तो भीतर-ही-भीतर असंतोष पनप सकता है।
खास रपट। सचिन कुमार सिंह
खरमास लगने से पहले भारतीय जनता पार्टी ने लगातार तीन बड़े संगठनात्मक फैसले लेकर सियासी हलकों में हलचल पैदा कर दी है। पहले उत्तर प्रदेश में पंकज चौधरी को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया, फिर बिहार सरकार के मंत्री नितिन नबीन को पार्टी का कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया और अब बिहार बीजेपी की कमान दरभंगा विधायक संजय सरावगी को सौंप दी गई है।
इन फैसलों को अगर अलग-अलग देखा जाए तो सामान्य संगठनात्मक बदलाव लग सकते हैं, लेकिन अगर इन्हें एक साथ जोड़ा जाए तो बीजेपी की नई राजनीतिक रणनीति साफ नजर आती है।
कोर वोटर से आगे बढ़ने की कोशिश
यूपी में पंकज चौधरी को कमान देकर बीजेपी ने कुर्मी वोट बैंक को साधने की कोशिश की है। वहीं बिहार में पार्टी ने सरकार गठन के समय ओबीसी समीकरण का खास ख्याल रखा था, लेकिन अब संगठनात्मक स्तर पर तस्वीर कुछ बदली-बदली दिख रही है।
सबसे पहले कायस्थ समाज से आने वाले नितिन नबीन को राष्ट्रीय स्तर की बड़ी जिम्मेदारी दी गई। बिहार में कायस्थों की आबादी एक फीसदी से भी कम है, इसके बावजूद यह नियुक्ति अगड़ा समाज के लिए एक बड़े राजनीतिक संकेत के तौर पर देखी जा रही है।
इसके बाद मारवाड़ी/वैश्य समाज से आने वाले संजय सरावगी को बिहार बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। वैश्य समाज की भी बिहार में आबादी सीमित है, लेकिन दोनों ही समुदाय बीजेपी के पारंपरिक और भरोसेमंद वोटर माने जाते हैं।
नैरेटिव की काट या नई सियासत?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन नियुक्तियों के जरिए बीजेपी उस आरोप की काट कर रही है, जिसमें कहा जा रहा था कि पार्टी पिछड़े वर्ग को साधने के चक्कर में अपने कोर वोटर माने जाने वाले वर्गों को नजरअंदाज कर रही है।
साथ ही एक बड़ी रणनीति यह भी मानी जा रही है कि बिहार जैसे राज्य में जातीय ध्रुवीकरण की राजनीति से बचा जाए। बिहार की राजनीति लंबे समय से यादव, कुर्मी, पासवान, ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जैसी जातियों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। किसी एक प्रभावशाली जाति से चेहरा आगे करने पर दूसरे वर्गों में असहजता और ध्रुवीकरण की स्थिति बनती रही है। ऐसे में बीजेपी ने उन समुदायों के नेताओं को आगे किया है, जिनके इर्द-गिर्द बड़े स्तर पर जातीय टकराव की राजनीति नहीं बनती।
लेकिन बड़ा सवाल- ब्राह्मण-राजपूत क्यों गायब?
इन सभी समीकरणों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि
ब्राह्मण और राजपूत समाज, जो बिहार की राजनीति में न सिर्फ प्रभावशाली हैं बल्कि आबादी के लिहाज से भी कमजोर नहीं माने जाते, उन्हें शीर्ष संगठनात्मक नेतृत्व से क्यों दूर रखा गया? न तो उन्हें सरकार में कोई विशिष्ट पद दिए गए न ये संगठन स्तर पर कहीं दिखते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बीजेपी की रणनीति का एक कड़वा सच यह है कि जिन जातियों का वोट स्थिर और भरोसेमंद होता है, उन्हें नेतृत्व कम और जिम्मेदारी ज्यादा दी जाती है।
ब्राह्मण और राजपूत समाज दशकों से बीजेपी के सबसे पक्के वोटरों में गिने जाते हैं। पार्टी को भरोसा है कि यह वर्ग असंतोष के बावजूद अंततः बीजेपी के साथ ही खड़ा रहेगा। इसी भरोसे के कारण इन्हें अक्सर “मैनेज्ड वोट बैंक” मान लिया जाता है, न कि “साधने वाला वोट बैंक”।
‘कम टकराव’ वाला नेतृत्व मॉडल
बीजेपी की मौजूदा लाइन यह भी मानी जा रही है कि संगठन के शीर्ष पदों पर ऐसे चेहरे हों, जिन पर किसी बड़े जातीय वर्ग का सीधा दावा न हो।
कायस्थ या वैश्य समाज से आने वाले नेताओं को आगे करने से न तो भूमिहार नाराज होते हैं, न राजपूत और न ही ब्राह्मण खुलकर विरोध की स्थिति में आते हैं।
यानी नेतृत्व ऐसा, जो सर्वसुलभ हो और विवाद से दूर रहे।
पीएम मोदी की ‘चार जातियां’ और नई पीढ़ी की राजनीति
पीएम नरेंद्र मोदी बार-बार देश की चार जातियों युवा, महिला, किसान और गरीबकृकी बात करते रहे हैं। नितिन नबीन जैसे अपेक्षाकृत युवा नेताओं को आगे करना इसी सोच से जोड़ा जा रहा है। माना जा रहा है कि बीजेपी भविष्य के नेतृत्व को अभी से तैयार करने और जातीय राजनीति से ऊपर उठने की कोशिश कर रही है। लेकिन क्या यह इतना आसान है जितना जताने की कोशिश की जा रही है, आखिर यह जाति कब तक किसी पार्टी में पिछलग्गू की भूमिका में रहेगी।
उपेक्षा या रणनीतिक चुप्पी?
फिलहाल बीजेपी यह तर्क दे सकती है कि ब्राह्मण और राजपूत समाज को सरकार में मंत्री पद, संगठन में जिला और मंडल स्तर पर प्रतिनिधित्व मिल रहा है। लेकिन सियासत में संदेश सबसे तेज टॉप पोजीशन से जाता है और वही फिलहाल इन वर्गों को मिलता नहीं दिख रहा।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर लंबे समय तक ब्राह्मण-राजपूत समाज को सिर्फ चुनावी मशीनरी के तौर पर देखा गया, तो भीतर-ही-भीतर असंतोष पनप सकता है।
-बीजेपी के ताजा फैसले यह बताते हैं कि पार्टी नए सामाजिक संतुलन की तलाश में है।
-जातीय ध्रुवीकरण से बचना चाहती है
लेकिन साथ ही अपने सबसे भरोसेमंद समर्थकों को यह संदेश देने में चूक रही है कि वे सिर्फ वोटर नहीं, भागीदार भी हैं।
आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि बीजेपी इस संतुलन को साध पाती है या नहीं। फिलहाल सवाल खुला है कि क्या ब्राह्मण और राजपूत समाज को सिर्फ इस्तेमाल किया जाएगा, या उन्हें भी निर्णायक भूमिका मिलेगी?





























































