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यूथ खासः बायोफ्लॉक से नीली क्रांति को मिलेगी गति, कम जगह और कम पानी में मछली का होगा उत्पादन, बढ़ेगी खुशहाली

बायोफ्लॉक एक आधुनिक व वैज्ञानिक तरीका है।मछली पालन के इस तकनीक को अपनाते हुए मत्स्य पालक न सिर्फ नीली क्रांति के अग्रदूत बनेंगे बल्कि बेरोजगारी से भी मुक्ति मिलेगी।

पीपराकोठी। राजेश कुमार सिंह

मछली पालन के बायोफ्लॉक तकनीक से जिले में नीली क्रांति को गति मिल सकेगी। वहीं मछली का उत्पादन दोगुना बढ़ेगा। यह एक आधुनिक व वैज्ञानिक तरीका है। तकनीक के माध्यम से किसान बिना तालाब की खुदाई किए एक टैंक में मछली पालन कर सकेंगे। मछली की बढ़ती खपत को देखते हुए मत्स्य पालक उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए नयी तकनीक को अपना रहें है। इसके लिए कम पानी और कम खर्च में अधिक से अधिक मछली उत्पादन करने हेतु बायोफ्लॉक तकनीक अपना रहे है।

बायोफ्लॉक एक आधुनिक व वैज्ञानिक तरीका है।मछली पालन के इस तकनीक को अपनाते हुए मत्स्य पालक न सिर्फ नीली क्रांति के अग्रदूत बनेंगे बल्कि बेरोजगारी से भी मुक्ति मिलेगी। बायोफ्लॉक तकनीक के माध्यम से किसान बिना तालाब की खुदाई किए एक टैंक में मछली पालन कर सकेंगे।

क्या है बायोफ्लॉक तकनीक
केविके प्रमुख डॉ.अरबिंद कुमार ने बताया कि यह कम लागत और सीमित जगह में अधिक उत्पादन देने वाली तकनीकी है। इस तकनीकी में टैंक सिस्टम में उपकारी बैक्टीरिया के द्वारा मछलियों की विष्ठा और अतरिक्त भोजन को प्रोटीन सेल में परिवर्तित कर मछलियों के भोज्य पदार्थ के रूप में रूपांतरित कर दिया जाता है। बायोफ्लोक्स, शैवाल, बैक्टीरिया, प्रोटोजोअन और कार्बनिक पदार्थों जैसे मछली की विष्ठा और अतरिक्त भोजन के समुच्चय होते हैं। इसमें 25 से 50 प्रतिशत प्रोटीन तथा 5 से 15 प्रतिशत वसा होती है। बायोफ्लोक्स विटामिन और खनिजों का भी अच्छा स्रोत है।

पालन योग्य मछलियों की प्रजातियां
पंगेसियस, तिलापिया, देशी मांगुर, सिंघी, कोई कार्प, पाब्दा, एवं कॉमन कार्प।

कहते हैं केविके प्रमुख
केविके प्रमुख डॉ.अरबिंद कुमार सिंह ने बताया कि इस तकनीक को लेकर किसानों को प्रशिक्षण दिया