– चीनियों को गलतफहमी हो गई कि अपने अधिकारी को गिरता देख भाग जाएंगे जवान, मगर हुआ इसके उल्टा
नेशनल डेस्क। यूथ मुकाम न्यूज नेटवर्क
लद्दाख के गलवां घाटी क्षेत्र में बिहार रेजिमेंट के जवानों ने अप्रतिम शौर्य का प्रदर्शन करते हुए सर्वोच्य बलिदान दिया। बिहार रेजीमेंट के सैनिकों ने चीनी सैनिकों को यह अहसास दिया दिया कि वे किसी भी स्थिति में पीछे हटने वाले नहीं हैं। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है कि झड़प के दौरान लगभग आधे भारतीय सैनिक मारे गए लेकिन, उन्होंने अंतिम समय तक वीरता से लड़ाई लड़ी।

 

 

चीनी सैनिकों से शांति से बात करने गए भारतीय कमांडिंग अधिकारी पर उन्होंने जब हमला किया, तो चीनियों को लगा कि अब भारतीय सैनिक अपने अधिकारी को गिरता देख डर के मारे वहां से भाग जाएंगे। लेकिन चीनियों की यह सोच गलतफहमी साबित हुई। इसके बदले उन्हें भारतीय सैनिकों के गुस्से और प्रतिकार का सामना करना पड़ा। भारतीय सैनिकों ने चीनियों की ज्यादा संख्या होने के बावजूद उन्हें करारा जवाब दिया।

हथियार होने के बावजूद नियमों का ध्यान रखते हुए बिहार रेजीमेंट के जवानों ने खाली हाथ चीनी सैनिकों का मुकाबला किया। घंटों चली इस झड़प में दोनों पक्षों की ओर से कई सैनिकों की जान गई। अमेरिकी इंटेलीजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक इस झड़प में चीन के 30 सैनिक और एक कमांडिंग अधिकारी भी मारा गया। सेना के एक वरिष्ठ अधिकारी ने गुरुवार को स्पष्ट क्या कि इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय सैनिकों ने बहादुरी से चीनियों को जवाब दिया और अंत तक डटे रहे।

शहीद हुए 20 जवानों में बिहार रेजीमेंट के 12 सैनिक
सेना की ओर से जारी शहीदों की सूची के मुताबिक 20 में से 12 सैनिक बिहार रेजीमेंट के थे। इस झड़प में बिहार रेजीमेंट के कमांडिंग अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू और जूनियर कमांडिंग अधिकारी कुंदन कुमार झा शहीद हो गए। इनके अलावा सिपाही अमन कुमार, चंदन कुमार, दीपक कुमार, गणेश कुंजाम, गणेश राम, केके ओझा, राजेश ओरांव, सीके प्रधान, नायब सूबेदार नंदूराम और हवलदार सुनील कुमार ने देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी।

बिहार रेजीमेंट की इसलिए होती है तैनाती
बिहार रेजीमेंट का शौर्य ऐतिहासिक है। यह रेजीमेंट भारतीय सेना के एक मजबूत अंग है। कहा जाता है कि बिहार रेजीमेंट के जवानों का प्रशिक्षण ऐसा होता है कि वह किसी भी स्थिति में रह सकते हैं। इसीलिए दुर्गम और जटिल परिस्थितियों में इन्हें तैनात किया जाता है और इसीलिए इन्हें एलएसी पर तैनात किया गया है। यह रेजीमेंट भारतीय सेना की सबसे पुरानी पैदल सेना रेजीमेंट में से एक है। इसका गठन साल 1941 में किया गया था।

करगिल युद्ध में भी भारत की जीत के पीछे बिहार रेजीमेंट के जवानों का बड़ा योगदान था। जुलाई 1999 में बटालिक सेक्टरे प्वाइंट 4268 और जुबर रिज पर जब पाक घुसपैठियों ने कब्जा करने की नापाक कोशिश की तो उन्हें खदेड़ने वाले बिहार रेजीमेंट के ही जवान थे। इसके साथ ही 18 सितंबर 2016 को जम्मू-कश्मीर के उरी में पाक घुसपैठियों से भी इसी रेजीमेंट ने लोहा लिया था। इस दौरान रेजीमेंट के 15 जवान शहीद हुए थे।

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