-न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग बल्कि सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनना भी जरूरी, शीघ्र नहीं संभले तो और बिगड़ते चले जाएंगे हालात
– घर से बाहर निकलते समय सभी मास्क पहने, इसके लिए कड़ी निगरानी जरूरी


नेशनल डेस्क। यूथ मुकाम न्यूज नेटवर्क
आखिर मार्च से जुलाई तक करीब पांच माह तक लाॅकडाउन व अनलाॅक के बीच झूलने के बाद भी भारत में कोरोना की गति मंद पड़ने के बावजूद तेज होती जा रही है। जो इस बात की इशारा कर रही है कि कहीं न कहीं चूक तो हुई है। इतना तो सबको समझ में आ जाना चाहिए कि कोरोना को रोकने के लिए सिर्फ लाॅकडाउन काफी नहीं है, सबसे ज्यादा जरूरी है ट्रेसिंग व टेस्टिंग। यहीं वजह रही कि बहुत से देश जहां मार्च-अप्रैल में कोरोना चरम पर था वहां इसकी रफ्तार थम गई है, मगर भारत व अमेरिका सरीखे कुछ ही देश हैं, जहां अभी भी कोरोना की रफ्तार तेज है। इस मामले में भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है।
सरकार को समझना चाहिए कि कोरोना रोकने के लिए सिर्फ लॉकडाउन ही काफी नहीं है। क्योंकि, जिन 10 देशों ने कोरोना पर काबू पाया है, वहां न सिर्फ ज्यादा से ज्यादा टेस्टिंग हुई, बल्कि सोशल डिस्टेंसिंग और मास्क पहनना भी जरूरी किया गया। आम नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

 

चीन समेत इन 10 देशों में एक समय कोरोना बेकाबू हो गया था, लेकिन अब वहां कोरोना पर काफी हद तक काबू पा लिया गया है। पहले नंबर पर चीन है, जिसे पूरी दुनिया में इस वायरस को फैलाने का श्रेय दिया जाता है।

1. चीन ने पहले देर की, फिर जहां एक भी केस मिला वहां पूरा शहर लॉकडाउन

दिसंबर के आखिर में चीन के हुबेई प्रांत के वुहान शहर के लोगों में नई बीमारी देखी गई। बाद में यही कोरोनावायरस बना। पहला केस आने के 7 हफ्ते बाद वुहान को लॉकडाउन किया गया। 76 दिन बाद 8 अप्रैल को वुहान से लॉकडाउन हटा। 24-25 जनवरी के बीच चीन के शंघाई, हैनान, जियांग्सु समेत कई प्रांतों में हुबेई से लौटने वाले लोगों के लिए 14 दिन का क्वारैंटाइन जरूरी कर दिया गया। एक फरवरी को हुबेई के हुआनगैंग शहर में भी कर्फ्यू लगा दिया गया और हर परिवार से सिर्फ एक ही व्यक्ति को हर दो दिन में जरूरी सामान खरीदने के लिए बाहर निकलने की इजाजत दी गई।
चीन ने कोरोना को फैलने से रोकने के लिए पूरे देश में लॉकडाउन नहीं लगाया। जिस इलाके में कोरोना का एक भी मरीज मिला, उसे पूरी तरह लॉकडाउन कर वहां के हर नागरिक का कोरोना टेस्ट किया गया। जैसे- मई में वुहान में कोरोना के 6 मरीज मिले तो अगले 10 दिन में वहां की एक करोड़ 10 लाख आबादी का टेस्ट हुआ।
इसका नतीजा ये हुआ कि अप्रैल से अब तक चीन में 1 प्रतिशत से भी कम नए मामले सामने आए। अप्रैल के अंत में यहां 82,862 मामले थे। 21 जुलाई तक 83,707 हुए। यानी 79 दिन में सिर्फ कुल 845 नए मामले सामने आए। इस दौरान सिर्फ एक कोरोना संक्रमित की जान गई।

2. इटलीः जिन मरीजों में लक्षण नहीं, उनका भी टेस्ट हुआ

31 जनवरी को पहला मामला सामने आने के बाद 22 फरवरी को इटली के वेनेटो और लोम्बार्डी के कुछ शहरों को लॉकडाउन किया गया। इनके बाद उत्तरी इटली के कई शहरों में लॉकडाउन लगाया लगा। 10 मार्च से पूरे इटली को लॉकडाउन कर दिया गया। लॉकडाउन लगने के तीन हफ्ते बाद ही इटली में रोज आने वाले नए मामले और होने वाली मौतों की संख्या में कमी आने लगी। इसका एक कारण टेस्टिंग भी था।
इटली में न सिर्फ कोरोना पॉजिटिव के संपर्क में आए लोगों की टेस्टिंग की गई। बल्कि, उन लोगों की भी टेस्टिंग हुई, जिनमें कोरोना के लक्षण नहीं थे। इसका नतीजा ये हुआ कि इटली में कोरोना के मामलों और मौतों में कमी आने लगी।

3. जर्मनीः टेस्टिंग टैक्सियां चलाईं, घर-घर जाकर मरीजों की टेस्टिंग की

जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल ने मार्च में कहा था- जर्मनी की 70ः आबादी कोरोना से संक्रमित हो सकती है। इस बयान से वहां डर तो फैला, लेकिन लोग सतर्क भी हो गए। कहा जाता है कि जनवरी में ही जर्मनी ने कोरोना टेस्टिंग किट बना ली थी और फरवरी तक पूरे देश में टेस्टिंग किट की व्यवस्था कर ली गई।
जर्मनी ने शुरू से ही टेस्टिंग पर फोकस किया। यहां के कई शहरों में टेस्टिंग टैक्सियां चलाई गईं, जो लॉकडाउन के दौर में घर-घर जाकर टेस्ट करती थीं। वहां अनाउंस किया गया कि अगर किसी को भी कोरोना के लक्षण दिख रहे हैं, तो उसे अस्पताल आने की जरूरत नहीं है। ऐसे लोगों को सिर्फ फोन करना है और घर पर ही उनका टेस्ट हो जाएगा।
हर हफ्ते एक लाख से ज्यादा लोगों तक की टेस्टिंग की गई। समय पर टेस्ट करने का फायदा ये हुआ कि लोगों का इलाज भी समय पर हो सका। उन्हें सही समय पर आइसोलेशन में रखा गया।

4. फ्रांसः बेवजह निकलने पर पाबंदी लगाई, घर से बाहर एक्सरसाइज का भी समय तय किया

24 जनवरी को फ्रांस में कोरोना का पहला केस आया। ये यूरोप का पहला मामला था। 14 फरवरी को यहां पहली मौत हुई, जो एशिया के बाहर पहली मौत थी। 17 मार्च को यहां टोटल लॉकडाउन कर दिया गया। बॉर्डर सील कर दिए गए। 11 मई से यहां ढील मिलनी शुरू हुई। 23 मार्च से फ्रांस में बेवजह घूमने पर पाबंदी लगा दी गई। अगर कोई घर से बाहर निकलता भी था, तो उसे अपने साथ एक सेल्फ डिक्लेरेशन लेटर रखना होता था, जिसमें बाहर निकलने का वाजिब कारण बताना होता था। एक्सरसाइज का भी समय एक घंटे तय किया गया। घर से बाहर सिर्फ एक किमी के दायरे में ही एक्सरसाइज करने का नियम बना।

5. यूके:103 दिन का लॉकडाउन लगा, तब जाकर संक्रमण कम हुआ

31 जनवरी को पहला मामला आने के बाद ब्रिटेन में 23 मार्च से टोटल लॉकडाउन कर दिया गया। कोरोना से निपटने के लिए यहां की सरकार की स्ट्रैटजी की जमकर आलोचना भी हुई। यहां टेस्टिंग भी उस स्तर पर नहीं हुई, जितनी यूरोप के बाकी देशों में हुई।
हालांकि, यहां मामले घटने का सबसे बड़ा कारण लॉकडाउन रहा। यहां 23 मार्च से 4 जुलाई तक 103 दिनों का लॉकडाउन रहा। लॉकडाउन के शुरुआत में यहां मामले लगातार बढ़ते रहे, लेकिन जब नए मामलों और मौतों में कमी आने लगी, तब जाकर लॉकडाउन हटाया गया।

6. स्पेन: लॉकडाउन का पालन कराने के लिए सेना भी उतारी गई

मार्च की शुरुआत से ही यहां पाबंदियां लगानी शुरू कर दी गईं। कई इलाकों में लॉकडाउन भी लगाया गया। 14 मार्च से पूरे देश में ही लॉकडाउन किया गया। लोग लॉकडाउन का पालन करें, इसके लिए यहां 2.50 लाख से ज्यादा पुलिसकर्मी और ढाई हजार से ज्यादा सेना के जवानों की तैनाती की गई।
इसका असर ये हुआ कि पिछले 50 दिन में यहां कोरोना से 400 से कम मौते हुईं। जबकि, इससे पहले यहां अप्रैल में यहां 16 हजार से ज्यादा जबकि मई में करीब चार हजार लोगों ने कोरोना से जान गंवाई थी। पिछले 50 दिन में कुल केस में भी सिर्फ 9 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। हांलाकि, यहां की सरकार पर आरोप लगता है कि उसने मौतें छिपाने के लिए और मामले कम करने के लिए टेस्टिंग ही नहीं की।

7. न्यूजीलैंड: कोरोना पॉजिटिव मरीज के संपर्क में आए लोगों को 48 घंटे में पहचाना

न्यूजीलैंड में कोरोनावायरस का पहला मामला सामने आने से पहले ही 3 फरवरी को यहां की सरकार ने चीन से आने वाले यात्रियों की एंट्री पर रोक लगा दी। हालांकि, न्यूजीलैंड के नागरिकों और यहां के परमानेंट रेसिडेंट को इससे छूट थी। इसके अलावा, जो लोग चीन से निकलने के बाद किसी दूसरे देश में 14 दिन बिताकर आए, उन्हें ही न्यूजीलैंड में आने की इजाजत थी।
न्यूजीलैंड में अगर कोई व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव मिलता, तो वहां की सरकार 48 घंटे के अंदर उसकी कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग करती। यानी, किसी व्यक्ति के कोरोना पॉजिटिव मिलने पर उसके सभी करीबी रिश्तेदारों-दोस्तों को कॉल किया जाता था और उन्हें अलर्ट किया जाता था। ऐसा इसलिए ताकि लोग खुद ही टेस्ट करवा लें या सेल्फ-क्वारैंटाइन में चले जाएं।

8. स्विट्जरलैंड: बिना लॉकडाउन के ही संक्रमण की रफ्तार रोकी

मार्च-अप्रैल में सबसे ज्यादा संक्रमित देशों की लिस्ट में स्विट्जरलैंड टॉप-10 में था। लेकिन, अब टॉप-50 से भी बाहर हो गया है। खास बात ये भी रही कि यहां पूरे देश में कभी लॉकडाउन नहीं लगाया गया। लेकिन, बार, दुकानें बंद कर दी गईं। पहला मामला सामने आने के दो दिन बाद ही एक जगह पर हजार लोगों के जुटने पर रोक लगा दी गई।
20 मार्च को यहां की सरकार ने 5 लोगों के एक साथ जुटने पर रोक लगा दी। मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग पर सख्ती रखी। इसका असर ये हुआ कि पिछले 18 दिन में सिर्फ 6 कोरोना संक्रमितों की जान गई है। वहीं, इस महीने अब तक 6 प्रतिशत से भी कम नए मामले सामने आए हैं। 16 अप्रैल से यहां पाबंदियों में छूट दी जाने लगी। अब यहां स्कूल, कॉलेज, ऑफिसेस, दुकानें, सैलून सब खुल गए हैं।

9. साउथ कोरिया: जगह-जगह टेस्टिंग सेंटर बने, कार में बैठे-बैठे ही टेस्ट करवा रहे लोग

स्विट्जरलैंड की तरह ही साउथ कोरिया भी मार्च के आखिर में टॉप-10 देशों में शामिल था। लेकिन, बाद में इसने भी कोरोना को ऐसे कंट्रोल किया कि अब 68वें नंबर पर आ गया है। इसके पीछे की वजह टेस्टिंग है।
साउथ कोरिया में टेस्टिंग पर फोकस किया गया। यहां जगह-जगह टेस्टिंग के लिए ऐसे सेंटर बनाए गए, जहां लोग कार में बैठे-बैठे ही टेस्ट करवा सकते थे। अगर उनकी रिपोर्ट पॉजिटिव आती, तो कॉल किया जाता और निगेटिव रिपोर्ट पर मैसेज। न सिर्फ टेस्टिंग सेंटर बल्कि टेस्टिंग लैब भी बनाए, जो 24Û7 काम करते थे।

10. ताइवान: मास्क न पहनने पर फाइन वसूला, जनवरी में ही चीन से आने-जाने वालीं उड़ानें रोकी

चीन के जिस वुहान शहर से कोरोनावायरस निकला, उस वुहान से ताइवान की राजधानी ताइपे महज 950 किमी दूर है। लेकिन, यहां कोरोना के मामले 500 भी नहीं पहुंच पाए। खास बात ये भी है कि कोरोना को फैलने से रोकने के लिए यहां टोटल लॉकडाउन नहीं लगाया गया था। सिर्फ स्कूल-कॉलेज और सार्वजनिक कार्यक्रमों पर ही रोक लगाई गई थी। वो भी कुछ समय के लिए।
31 दिसंबर को चीन में अचानक 27 मामले सामने आए थे। उसके बाद ताइवान सरकार ने एडवाइजरी जारी कर वुहान से आने वाले हर शख्स की स्क्रीनिंग शुरू कर दी। इसके साथ ही जो भी लोग पिछले 15 दिन में वुहान से लौटकर आए थे, उन सभी की निगरानी होने लगी। चीन में मामले बढ़ते देख ताइवान ने 26 जनवरी को ही चीन से आने वाली और चीन जाने वाली सभी तरह की उड़ानों पर रोक लगा दी। अप्रैल में ही ताइवान की सरकार ने साफ कह दिया कि जो भी बिना मास्क पहने बस-ट्रेन में यात्रा करने की कोशिश करेगा, उससे 15 हजार ताईवान डॉलर यानी करीब 38 हजार रुपए का फाइन वसूला जाएगा।

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