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व्यंग्यः ‘सम्मान ले लो सम्मान, टके के भाव में बेच रहा, है कोई खरीदार?

यूथ खास। सचिन कुमार सिंह

‘सम्मान’ ले लो ‘सम्मान’, टके के भाव बेच रहा हूं, क्योंकि हमारी औकात भी टके की ही है। न तो ‘सम्मान’ बांटने की हमारी कोई क्राइटेरिया है, न ही तथाकथित सम्मानित लोगों के चयन के लिए कोई विेशष प्रक्रिया। बस इसका एक ही आधार है कि आदमी मालदार हो और सम्मान पाने की ललक में कुछ अंटी ढीला करने की क्षमता रखता हो, बाकी सब ठीक है।

नहीं तो जब,जिसे, जिसकों देना होगा, दे देंगे। और हर अखबार की दफ्तर से एक खबरनवीस का तो चयन पक्का है, नहीं तो ससुरी खबर छापेगा कौन। गर नहीं छापेगा तो आयोजन करने का फायदा क्या होगा। लोग तो सम्मान इसी लिए पाते हैं कि उनको सम्मान मिलेगा तो अखबार में नाम होगा, इस नाम का फायदा उठा अपने कारोबार को चमका लेंगे। भले ही लाइफ में कोई तुक्का न मारा हो, मगर सम्मान पाने के बाद तो वे वे फूल कर कुप्पा हो ही जाते हैं। उन्हें लगता है कि इस सम्मान को पाकर वे भी अकबर के नौ रत्नों में शामिल हो गए हैं। न रत्न मिला तो श्री जरूर जुड़ा रहता है। तो भइया अपने चंपारण में बगैर खाता-बही व पूंजी कोई धंधा फल-फूल रहा है तो वह है सम्मानित करने का। इस धंधे में वे ही लोग हैं जो खुद अपने क्षेत्र में किसी सम्मान लायक न हो, मगर इससे सम्मान पाने वालों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

वे बस यहीं देखते हैं कि सम्मान देने के लिए किसी बड़े आदमी को मंच पर बुलाया जा रहा है या नहीं। और सम्मान देने वाले भी पक्के घाघ होते हैं, वे भी सौदेबाजी पर उतर आते हैं। मंत्री से सम्मान पाना हो तो इतना, संतरी से सम्मान पाना हो तो इतना और हमसे सम्मान पाना है तो कुछ दो या न दो बस प्रचारमंत्री बन जाओ। कुछ लोगों ने तो कागज पर ही सम्मान बांटने की दुकान खोल रखी है। और मीडिया हाउस को विज्ञप्ति भेजकर हर सीजन अपनी दुकान को लमकाते-चमकाते हैं। सम्मान पाने वाले तो उनसे भी महान, वे सम्मान के दुकानदार से कभी यह नहीं पूछते कि भइया, तुम जो बांट रहे हो उसकी कोई वैधानिकता है या ऐसे ही आ गए मुंह उठाके..धंधा जमाने। पूछे भी क्यों, गांठ का पक्का, नाम नयनसुख। उन्हें तो सम्मान से मतलब है, चाहे रास्ते का फकीर दे दे या…। चलिए जाने दीजिए, ज्यादा लिख देंगे तो

कहीं आपको मिलने वाला सम्मान ही बुरा न मान जाये। बाकी आप खुदे समझदार हैं। नहीं है तो बनिए। नहीं बनना है तो अपना क्या जाता, इसमें तेरा ही घाटा। भइया, अपना चम्पारण प्राचीन काल से सम्मान देने का हाल जानता है। तभी तो गुजरात के एक वकील को सम्मान देकर गांधी बना दिया।

खैर, इतिहास में सिर घुसेड़ने से सिर पर बचे-खुचे बाल के गायब हो जाने का खतरा है। इसलिए वर्तमान में आइए, माल खरचा कीजिए और महाराज की उपाधि पा लीजिए। हमें क्या, हम तो इस लायक भी नहीं कि अपने लिए ससुर एक सम्मान तक खरीद सके। आप कह सकते हैं कि मियां इसी कारण इतनी लंबी दिए जा रहे हो, जाओ पहले कहीं मुंह धोकर खुद सम्मान खरीदने लायक हैसियत बनाओ, क्योंकि अब सम्मान भी बिकाउ हो गया है। उपभोक्ता संस्कृति में जो बिकता है, वहीं दिखता है, और हम बिक कर दिख रहे हैं तो तुम्हारे पिछवाड़े आग क्यों लगी है। हमारे लिए कोई नई बात थोड़े है, यहां तो आये-दिन कोई न कोई थैला लेकर सम्मान बांटने आ जाता है, मैं न खरीदूंगा, कोई और खरीद लेगा…तो मेरी औकात है तो खरीद लिया, तुम्हारी नहीं है तो तुमने लिख दिया।
बाकी सम्मान बांटने वाले भइया जी, कुछ तो सम्मान का लिहाज रख लो किसी को रत्न, श्री और न जाने, कैसी-कैसी उपाधि से नवाजने से पूर्व एक बार यह भी तो देख लो कि कहीं तुम्हारे सम्मान के कारण अगले दिन बेचारे का सोसाइटी में मजाक न बन जाये। बाकी हमरा काम है समझाना, समझा दिया, न समझे तो अनाड़ी थोड़े हो जाओगे…तुम तो सम्मान की पिच के आॅलराउंडर खिलाड़ी ठहरे…तो लगाये जाओ दनादन चैके-छक्के। हम तो बस मंगल कामना कर सकते हैं कि भगवान तुम्हारे सम्मान की ‘लाज’ रखे। वैसे कलयुग में भगवान भक्त की सुनेंगे या सुनकर अनसुना कर देंगे, यह उन्हीं पर छोड़ता हूं। बाकी की भड़ास फिर कभी, इतना लिखकर मैं अपनी लेखनी की

कलम तोड़ता हूं। धन्यवाद।

 

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