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पूजा- पाठ के अवसर पर अश्लील आर्केस्टा और नाच भारतीय संस्कृति के लिए खतरा, बोले शिक्षाविद संदीप रौनक

Kewlam

मोतिहारी। यूथ मुकाम न्यूज नेटवर्क
यह सर्वविदित है कि पूजा – पाठ करने से मन में पवित्रता का जन्म होता है ! पवित्रता से मन में शांति प्राप्त होती है और शांति से मन में श्रेष्ठ , उच्च कोटि के सकारात्मक विचार आते हैं. जिसके फलस्वरूप परमात्मा से आत्मा का मिलन की अनुभूति होती है . उक्त बातें प्रेस वार्ता के दौरान चंपारण नैतिक शिक्षा प्रसार समारोह के प्रणेता संदीप कुमार रौनक ने कही! साथ ही उन्होंने कहा कि भारतीय पर्व और परंपराओं मे नवरात्र पवित्र रात्रि व पवित्र दिन कहे जाते हैं! यह साधना, उपासना, मंत्र साधना,सत्य को प्राप्त करने का,ब्रह्मचर्य पालन करने का, इष्ट देव को सिद्ध करने के लिए, अच्छे कर्म व वचन पवित्र भाव तथा नैतिकता के पालन के लिए, अनंत शक्तियों के जागृत करने के लिए, कुछ अच्छा हासिल करने का सर्वाेत्तम दिन है तथा पापों को नष्ट और अवगुणों को त्यागने का दिन है!
परंतु आज पूजा के नाम पर हो रहे अश्लील आर्केस्ट्रा, नाच तथा अश्लील गानों के तर्ज पर भक्ति गीत हमारे मन को कैसे ईश्वर से जुड़ पाएगा ? नवरात्रि की उपासना के दिनों में देवी के नौ रूपों का पूजा अर्चना में अपने आप को समर्पण किया जाता है, पूजा के नौवें दिन कुंवारी कन्याओं को माता का रूप मानकर प्रेम – भाव से भोजन करा कर, दान – दक्षिणा देकर आशीर्वाद लेते हैं! ये प्रथा तो आज भी चल रही है परंतु इसमें प्रेम भाव कम होता नजर आ रहा है केवल वाह्य पूजा ही भव्य हो रहा है ! माता रानी के जयकारे गला फाड़ फाड़ कर लगाया जा रहा है! खेल तमाशा, मेला और नृत्य का आयोजन ही मुख्य बन गया है! रात के प्रथम पहर शुरू होते ही शहर के लोग पूजा का मुख्य उद्देश्य भूल कर अपने बच्चे बच्चियों को पूजा के महत्व, तौर तरीके और भारतीय परंपराओं को बताने और समझाने के बजाय उसे डांडिया नृत्य सिखाया जा रहा है! जिसके फलस्वरूप बच्चे और बच्चियां अपनों से बड़े छोटों का लिहाज छोड़कर आनंद पूर्वक नृत्य कर रही हैं. और बड़े बुजुर्ग एक साथ बैठकर बड़े ही चाव से नृत्य देख कर वाह-वाह कर रहे हैं.

 

जिस कारण बच्चे और बच्चिया पूजा पाठ करने से ज्यादा नृत्य करने में अपनी शान समझ रहे हैं. जबकि उन्हें रामायण का नाटक मंचन कर कराकर उनमे उनमे राम और सीता जैसे चरित्र भरने क़ी जरूरत है! डांडिया नृत्य को पूजा पाठ मे जोड़कर व्यवसायीकरण किया जा रहा है! नए-नए धुन और गाने आ रहे हैं! इस नृत्य के लिए बड़े-बड़े होटल, हॉल और साउंड बुक किए जा रहे हैं! पूजा का वास्तविक मूल छोड़कर, नृत्य ही भौतिक पूजा बन गया है ! वहीं गांव व कस्बों में बुजुर्ग, युवा पीढ़ी और बच्चे अश्लील आर्केस्ट्रा तथा नाच में अपने आप को झोंक रहे हैं! क्या इस तरह के पूजा – पाठ और आयोजनों से अपनी परंपराओं, पर्व, संस्कृति तथा आने वाले पीढ़ियों को आगे बढ़ाया जा सकता है? आने वाली पीढ़ी क्या सीख रही है? यह चिंतनीय योग्य है! पूजा पाठ में बाहरी दिखावा के बिना, सिर्फ ईश्वर का ही चिंतन होना चाहिए !क्योंकि ईश्वर को निर्मल व निश्छल प्रेम- भाव के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है! बाहरी संसाधनों से नहीं!

जिले के लगभग सभी गांव, कस्बों में पूजा पंडालो के आस – पास नवरात्र की रात्रि में अश्लील आर्केस्ट्रा व नाच का भव्य आयोजन हो रहा है ! ऐसा प्रतित हो रहा है कि आर्केस्टा के लिए ही पूजा हो रहा है! विशेषकर माता की प्रतिमा विसर्जन जुलूस में अधिकांश जगहों पर आर्केस्ट्रा नचवा कर प्रतिमा का विसर्जन कराया जाता है! जिस से आने वाली पीढ़ी के अंदर गलत संस्कार एवं धारणा उत्पन्न हो रही है! जो हमारे विश्व वंदनीय, विश्व के सबसे पुराने सभ्यता और संस्कृति को धूमिल कर रहा है!

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