– मां लक्ष्मी की कृपा पाने के लिए बाहरी सफाई ही नहीं मन की मलीनता को भी दूर करें, आसुरी संस्कार का परित्याग करें

फीचर डेस्क। सर्वेश कुमार तिवारी

कार्तिक अमावस्या को भारतवर्ष के घर- घर में प्रकाश दीप जगमगा उठते हैं और सारे लोग आनंद से भर जाते हैं। सभी अपने अपने घरों की तथा कपड़ों की सफाई करते हैं व्यापारी लोग इस शुभ दिवस पर पुराने खाते को बंद कर नया खाता खोलते हैं। मान्यता है कि धन की देवी लक्ष्मी इसी रात्रि में भ्रमण करती हैं और अलौकिक घरों को धन- धान्य से परिपूर्ण कर देती हं,ै लेकिन कभी हम लोगों ने यह विचार नहीं किया कि लक्ष्मी के स्वागत के लिए प्रतिवर्ष दीपमाला जलाकर भी हम अपनी दरिद्रता को समाप्त नहीं कर पाते हैं।

जगमगाते दीपों को देखकर भी श्री लक्ष्मी हमसे क्यों रूठे रहती हैं। जलते हुए दीप उनको आकृष्ट क्यों नहीं कर पाता। वह कौन सा दीप जलाना चाहती है वस्तुतः हम विचार करें तो आत्मा ही सच्चा दीपक है जो विकारों के वशीभूत हो जाने के कारण आत्मा का प्रकाश मलीन हो गया है। मनुष्य की अंतरात्मा तमसाच्छन्न है, ऐसे विकारी मनुष्यों के बीच श्री लक्ष्मी का शुभागमन कैसे हो सकता है।

लेकिन कितनी विडंबना है कि आत्म दीप प्रज्वलित कर कमल पुष्प सदृश अनासक्त बन कमला सीन श्री लक्ष्मी का आवाहन करने की जगह हम मिट्टी के दीप जलाकर बच्चों का खेल खेलते रहते हैं। मन मंदिर की सफाई करने की जगह बाह्य सफाई से ही हम खुश हो जाते हैं, तभी तो श्रीलक्ष्मी हमसे रूठ गई है। कमल सा दृश्य बन कर ही हम कमला को प्राप्त कर सकते हैं। अमावस्या की इस काली रात्रि की तरह आज सारे विश्व में घोर अज्ञान अंधकार, पापाचार, भ्रष्टाचार, अनाचार छाया हुआ है। कहीं कुछ सूझ नहीं रहा है। मत मातन्तर के जाल में मानव मात्र भ्रमित है सभी आत्माओं की ज्योति बुझ चुकी है ऐसे समय में सदा जागति ज्योति निराकार परमपिता परमात्मा सर्व आत्माओं की ज्योति जगाने के लिए कल्प पूर्व की भांति इस धरा पर अवतरित होंगे और प्राय गीता ज्ञान तथा सहज राजयोग की शिक्षा देकर निर्विकारी बनाकर बुझी हुई आत्मज्योति को जगाएंगे। तभी हम सच्ची दीपावली मान सकते हैं, तब ही इस देवभूमि भारतवर्ष पर श्री लक्ष्मी और श्री नारायण के देवी स्वराज की पुनर्स्थापना होगी जहां रत्न जडीत स्वर्णमहल होंगे और घी तथा दूध की नदियां बहेगी इस युगान्तकारी घटना की पावन स्मृति में ही हम दीपावली का त्यौहार मनाते हैं।

इस अवसर पर सदा जागती ज्योति निराकार परमात्मा का प्रतीक एक बड़ा दीपक जलाया जाता है और उसी दीपक से अन्य दीपकों की ज्योति जलाई जाती है अन्य किसी देवता के मंदिर में सदा दीप नहीं जलता है, लेकिन आज भी काशी के भगवान विश्वनाथ के मंदिर में अनवरत दीप जलता रहता ह,ै क्योंकि एकमात्र निराकार शिव परमात्मा ही सदा जागती ज्योति है। निराकार परमपिता परमात्मा के सकार अवतरण के बाद हम ईश्वरीय ज्ञान तथा सहज राज् योग की शिक्षा प्राप्त कर, जब हम निर्विकारी बनते हैं, तो हमारा एक नया जन्म जिसे हम मरजीवा जन्म कहते हैं, जिससे हमारे पुराने आसुरी स्वभाव संस्कार और संबंध समाप्त हो जाते हैं तथा नए देवी स्वभाव संस्कार और संबंध बनते हैं।

इसी की स्मृति में व्यापारी वर्ग इस दिन पुराने खाते को बंद कर नया खाता खोलते हैं। परम पिता परमात्मा शिव के साथ व्यापार करने वाले आध्यात्मिक साधकों का परम कर्तव्य है कि वे आसुरी अवगुणों का खाता बंद कर देवी गुणों के लेनदेन का खाता खोलें, जिससे आगामी सृष्टि में वे श्री लक्ष्मी का सानिध्य प्राप्त कर सकेंगे आइए आज हम प्रतीज्ञा करे कि इस ईश्वरीय ज्ञान और सहज राजयोग की शिक्षा द्वारा मन मंदिर की सफाई कर सदा जागति ज्योति निराकार परमात्मा शिव से आत्मा की ज्योति प्रज्वलित करेंगे। आसुरी अवगुणांे और संस्कारों का खाता बंद कर देवी गुण संपन्न बनेंगे तथा अपने तन, मन, धन को मानव मात्र के आध्यात्मिक उत्थान में लगाएंगे, फिर तो इस पुण्य भूमि भारत वर्ष पर श्री लक्ष्मी, श्री नारायण के देवी स्वराज की पुनस्र्थापना हो जाएगी, जहां दुख, अशांति का नामोनिशान भी नहीं रहेगा और शेर-बकरी एक घाट पर जल पीएंगे। खूब धन-संपत्ति से नर नारी मालामाल हो जाएंगे, इतना महान अंतर है मिट्टी के दीपक जलाने और चेतन आत्मा की ज्योति प्रज्वलित करने में।

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