Home कथा-कहानी कहानीः बूढ़ा दरख्तः एक मार्मिक लघु कहानी

कहानीः बूढ़ा दरख्तः एक मार्मिक लघु कहानी

-सचिन कुमार सिंह

सत्यनारायण बाबू, घर के अहाते में लगा दरख्त काटने के पक्ष में जरा भी न थे। पेड़ जरा पुराना सही मगर अभी भी काफी उपयोगी था। सबसे बड़ी बात तो यह कि इस पेड़ के साथ उनकी कई खट्टी-मीठी यादें जुड़ी थीं। वे बचपन से ही इस पेड़ को देखते आ रहे थे, तब तो गर्मी की हर दोपहर व हर शाम इस पेड़ के नीचे गुजरती। हर शाम यहां गांव के बुजुर्ग लोगों की महपिफल सजती। तब उनके दादाजी, पिताती व गांव के बड़े-बुजुर्ग दिन-दुनियावी बातों की ऐसी जंग छेड़ते कि देखते ही देखते आध्ी रात गुजर जाती, कोई टस से मस होने का नाम नहीं लेता। पिफर वक्त ने करवट ली, आध्ुनिकता की छाप गांव में भी दिखाई देने लगी। गांव में बिजली आ गई। जो ज्यादा संपन्न थे वे जेनरेटर-इंवर्टर रखने लगे। पावर कट का उनके पास परमानेंट सोल्यूशन मौजूद था। अब एसी-कूलर की हवा के सामने ऐसे पेड़ों की बिसात ही क्या, कौन पफटगेगा इनके पास। सत्यनारायण बाबू भी ऐसे ही चंद संपन्न लोगों में शुमार थे, जिनके यहां आध्ुनिक सुख-सुविध के सभी साध्न मौजूद थे। ऐसे में उनके पुत्रा अवध्ेश बाबू को यह बूढ़ा पेड़ खटकने लगा था। वे इस जगह का उपयोग नए कंस्ट्रक्शन में करना चाहते थे, मगर सत्यनारायण बाबू ने सापफ मना कर दिया। उन्होंने पुत्रा की इस मंशा का पुरजोर विरोध् करते हुए यहां तक ध्मकी दे दी कि अगर उसने जोर-जबरदस्ती पेड़ कटवाने की कोशिश की तो वे वन विभाग में शिकायत कर देंगे। पिता के सख्त तेवर देख पिफलहाल पुत्रा को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। बात आयी-गई हो गई।
एक दिन सत्यनारायण बाबू दूसरे गांव से घूमकर वापस आए तो पेड़ की हालत देख दंग रह गए। पेड़ तो पिफलहाल सही-सलामत था, मगर बड़ी ही ध्ूर्तता के साथ एक तरपफ से उसकी छंटाई कर दी गई थी। एक तरपफ की टहनियां व जड़ें काट दी गई थी। तो अब इसका भगवान ही मालिक है। वे सर्द आह भरते हुए घर के अंदर दाखिल होने लगे तो पुत्रा ने कुटिल मुस्कान के साथ उनका स्वागत करते हुए कहा-‘‘ पिताजी, पेड़ की टहनियां कापफी स्पेस घेर रही थी, सो एक ओर से इसकी छंटाई करा दी।’’ सत्यनारायण जी अब भला कर ही क्या सकते थे, वे बगैर कुछ कहे अपने कमरे के अंदर चले गएं।
सत्यनारायणजी की आशंका निर्मूल साबित नहीं हुई, एक दिन अचानक आई तेज आंध्ी में वह बू़ढ़ा पेड़ खुद को संभाल नहीं पाया और जड़ सहित भरभरा कर गिर गया। उसका अंत हो चुका था। सत्यनारायण बाबू को ऐसा लगा मानो उनके शरीर से प्राण निकल गया हो। वे भी तो इस घर के लिए इसी बूढ़े दरख्त की तरह हो चुके थे, बेकार व अनुपयोगी तो क्या…?